ye gunha kabhi bhulkar nahi karunga mein
tujhe khudse be dakhal nHi krunga me
he manzoor ki doob jau apni wafa lekar bewafao ki kashti mein to safar nahi krunga me
घर के किसी कोने में रौनक नही मिलेगी ज़माने भर में ये मोहब्बत नही मिलेगी एक माँ ही है जो कलेजा निकल कर रखदेगी तुम्हारे लिए ओर किसी में ये सदाकत नही मिलेगी इसकी दुआओं का असर है कामयाबी तुम्हारी किसी तावीज़ से ये बरकत नही मिलेगी दिल मत दुखाना कभी अपनी माँ का दोस्तों ये गर रूठ गयी तो इबादतों से भी जन्नत नही मिलेगी।
ज़मानें की हकीकत से हकीकतन अनजान हूँ में कोई बसेरा नही मुझमें एक शहर वीरान हूँ में कुछ यादें कुछ रिश्ते दफन हें मुझमें चलता फिरता कब्रिस्तान हूँ में खुशियां देकर गम चुरा लेता हूँ अजनबियों को भी हमराज़ बना लेता हूँ फिर भी इल्ज़ाम लगे हें बेईमान हु में सांसे चल रही हें अब तो रस्मन अनस वेसे दिल से तो बेजान हूँ में तन्हाईयों में घिर कर पत्थर हो गया हूं पहले कभी लगता था इंसान हु में ज़माने की हकीकत से हकीकतन अनजान हूँ में
मेने देखा उसकी आँखों का काजल फिर रुख़सारों का चमकना भी देखा है मेने देखा है उस फूल को खिलते हुए फिर उसका महकना भी देखा है मेने देखा है उसको दिल की नज़रों से फिर दिल का मचलना भी देखा है मेने देखा है मेरे यार को हस्ते हुए फिर बारिश का मेने बरसना भी देखा है मेने देखा है उसकी पेशानी पे गुस्से की लहरों को वेसे तो मैने दरिया भी देखा है मेने देखा है सुकूँ है बस उसकी बाहों में करके तो मेने सजदा भी देखा है मेने देखा है सारी उम्र बस उसी को ओर लगता है सारा जहां देखा है।
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